ओडिशा के मयूरभंज में 'महापाषाणकालीन शैल कला' की नई खोज: भारत के प्राचीन इतिहास में नया अध्याय
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने ओडिशा के मयूरभंज जिले में 'महापाषाणकालीन शैल कला' के एक महत्वपूर्ण स्थल की खोज की घोषणा की है। इस खोज में कई शैल चित्र और नक्काशी शामिल हैं, जो लगभग 3,000 से 4,000 वर्ष पुराने माने जा रहे हैं। यह स्थल पूर्वी भारत में महापाषाणकालीन संस्कृति के प्रसार और कलात्मक अभिव्यक्तियों पर नई रोशनी डालता है, जिससे क्षेत्र के प्राचीन इतिहास की समझ में वृद्धि होगी।
2-Minute Summary (TL;DR)
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने ओडिशा के मयूरभंज जिले में महापाषाणकालीन शैल कला स्थल की खोज की घोषणा की।
- यह खोज 16 मई, 2026 को की गई और सिमिलिपाल बायोस्फीयर रिजर्व के बाहरी इलाके में स्थित है।
- शैल कला लगभग 3,000 से 4,000 वर्ष पुरानी मानी जा रही है।
- खोजे गए चित्रों में ज्यामितीय पैटर्न, मानव आकृतियाँ और जानवरों के चित्र शामिल हैं।
- चित्रों को बनाने में लाल गेरू और सफेद रंगद्रव्य का उपयोग किया गया है।
- ASI के महानिदेशक डॉ. आर.के. शर्मा ने इस खोज को महत्वपूर्ण बताया।
- यह खोज पूर्वी भारत में महापाषाणकालीन संस्कृति के भौगोलिक प्रसार पर नई जानकारी प्रदान करती है।
- स्थल को राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में अधिसूचित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
- यह भारत के प्रागैतिहासिक कला इतिहास और मानव-पर्यावरण संबंधों को समझने में मदद करेगा।
- प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 इस तरह के स्थलों के संरक्षण का मुख्य कानून है।
Why In News
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने 16 मई, 2026 को ओडिशा के मयूरभंज जिले में एक नए महापाषाणकालीन शैल कला स्थल की खोज की आधिकारिक घोषणा की है। यह खोज पूर्वी भारत में प्रागैतिहासिक मानव बस्तियों और उनकी कलात्मक प्रथाओं के बारे में हमारी समझ को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाती है, जिससे यह वर्तमान में एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक विषय बन गया है।
Syllabus Connection
यह खोज भारत के प्रागैतिहासिक काल, विशेषकर महापाषाणकालीन संस्कृति और शैल कला के विकास को समझने में महत्वपूर्ण है। यह छात्रों को प्राचीन भारतीय समाजों की कलात्मक अभिव्यक्तियों और उनके भौगोलिक प्रसार का अध्ययन करने में मदद करता है।
Prelims vs Mains — What to Focus On
| Aspect | Prelims | Mains |
|---|---|---|
| क्या | महापाषाणकालीन शैल कला की नई खोज। | प्रागैतिहासिक कला, संस्कृति और मानव बस्तियों पर इसके निहितार्थ। |
| कहाँ | ओडिशा के मयूरभंज जिले में, सिमिलिपाल बायोस्फीयर रिजर्व के पास। | पूर्वी भारत में महापाषाणकालीन संस्कृति के प्रसार का महत्व। |
| कब | 16 मई, 2026 को ASI द्वारा घोषित; 3,000-4,000 वर्ष पुरानी। | भारत के प्रागैतिहासिक कालक्रम में इसका स्थान और योगदान। |
| महत्व | ज्यामितीय पैटर्न, मानव/पशु आकृतियाँ, लाल गेरू/सफेद रंगद्रव्य। | प्राचीन समाजों के विश्वासों, दैनिक जीवन और कलात्मक तकनीकों की समझ। |
| संरक्षण | ASI द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में अधिसूचना। | पुरातात्विक स्थलों के संरक्षण की चुनौतियाँ और कानूनी ढाँचा। |
How This Topic is Tested in Competitive Exams
| Exam | Frequency | Approx. Marks | What Gets Asked |
|---|---|---|---|
| UPSC / State PCS | High | 10–20 | Ancient, medieval, and modern history form a full section in UPSC Prelims and GS-I Mains. |
| SSC (CGL / CHSL / MTS) | Medium | 3–5 | Modern Indian history, freedom struggle, and cultural heritage appear in SSC CGL. |
| State PCS / PSC | High | 5–10 | Regional history is specifically tested in state exams — Maratha history in Maharashtra, etc. |
| Railway (RRB NTPC / Group D) | High | 4–7 | Freedom fighters, historical events, and national anniversaries are very common in Railway GK. |
Key Facts to Remember: ओडिशा के मयूरभंज में 'महापाषाणकालीन शैल कला' की नई खोज: भारत के प्राचीन इतिहास में नया अध्याय
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने ओडिशा के मयूरभंज जिले में महापाषाणकालीन शैल कला स्थल की खोज की घोषणा की।
- यह खोज 16 मई, 2026 को की गई और सिमिलिपाल बायोस्फीयर रिजर्व के बाहरी इलाके में स्थित है।
- शैल कला लगभग 3,000 से 4,000 वर्ष पुरानी मानी जा रही है।
- खोजे गए चित्रों में ज्यामितीय पैटर्न, मानव आकृतियाँ और जानवरों के चित्र शामिल हैं।
- चित्रों को बनाने में लाल गेरू और सफेद रंगद्रव्य का उपयोग किया गया है।
- ASI के महानिदेशक डॉ. आर.के. शर्मा ने इस खोज को महत्वपूर्ण बताया।
- यह खोज पूर्वी भारत में महापाषाणकालीन संस्कृति के भौगोलिक प्रसार पर नई जानकारी प्रदान करती है।
- स्थल को राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में अधिसूचित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
- यह भारत के प्रागैतिहासिक कला इतिहास और मानव-पर्यावरण संबंधों को समझने में मदद करेगा।
- प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 इस तरह के स्थलों के संरक्षण का मुख्य कानून है।
Practice Questions
Q1. हाल ही में महापाषाणकालीन शैल कला की नई खोज भारत के किस राज्य में की गई है?
- मध्य प्रदेश
- कर्नाटक
- ओडिशा
- तमिलनाडु
Explanation: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने 16 मई, 2026 को ओडिशा के मयूरभंज जिले में एक नए महापाषाणकालीन शैल कला स्थल की खोज की घोषणा की है। यह खोज पूर्वी भारत में प्रागैतिहासिक कला के महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करती है।
Q2. मयूरभंज में खोजे गए शैल चित्रों की अनुमानित आयु क्या है?
- लगभग 1,000 वर्ष
- लगभग 2,000 वर्ष
- लगभग 3,000 से 4,000 वर्ष
- लगभग 5,000 से 6,000 वर्ष
Explanation: प्रारंभिक विश्लेषणों से पता चला है कि मयूरभंज में खोजे गए शैल चित्र लगभग 3,000 से 4,000 वर्ष पुराने हो सकते हैं। यह उन्हें भारत की सबसे पुरानी महापाषाणकालीन शैल कलाओं में से एक बनाता है।
Q3. यह शैल कला स्थल ओडिशा के किस बायोस्फीयर रिजर्व के बाहरी इलाके में स्थित है?
- भितरकनिका बायोस्फीयर रिजर्व
- सिमिलिपाल बायोस्फीयर रिजर्व
- नंदनकानन बायोस्फीयर रिजर्व
- सतकोसिया बायोस्फीयर रिजर्व
Explanation: यह महत्वपूर्ण महापाषाणकालीन शैल कला स्थल ओडिशा के मयूरभंज जिले में सिमिलिपाल बायोस्फीयर रिजर्व के बाहरी इलाके में स्थित है। यह क्षेत्र अपनी समृद्ध जैव विविधता और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है।
Q4. भारत में महापाषाणकालीन स्थलों के संरक्षण के लिए मुख्य कानून कौन सा है?
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
- प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958
- भारतीय वन अधिनियम, 1927
Explanation: भारत में प्राचीन स्मारकों और पुरातात्विक स्थलों तथा अवशेषों के संरक्षण के लिए मुख्य कानून 'प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958' है। यह अधिनियम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को इन स्थलों की सुरक्षा और प्रबंधन का अधिकार देता है।
Q5. महापाषाणकालीन शैल कला में आमतौर पर किन रंगों का उपयोग किया जाता था?
- नीला और हरा
- पीला और काला
- लाल गेरू और सफेद रंगद्रव्य
- बैंगनी और नारंगी
Explanation: मयूरभंज में खोजे गए शैल चित्रों में लाल गेरू और सफेद रंगद्रव्य का उपयोग किया गया है। ये रंग प्रागैतिहासिक शैल कला में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते थे और विभिन्न खनिज स्रोतों से प्राप्त किए जाते थे।
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